शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

क्या परिच्छा दे "कटहल"

जटाशंकर ,अब प्राइमरी स्कूल मे अध्यापक है , बचपन ने बहुत ही शरारती थे पढ़ाइ लिखाइ मे मन नही लगता था । इनकि शरारतो से लोग इतना परेशान थे कि लोगों ने इनका नाम पखंडु रख दिया था। एक किस्सा तो ये खुद ही बताते है।
एक बार उनको कोइ इक्ज़ाम देने जाना था।  इक्जा़म का सेंटर घर से कोइ 10-15 किलोमीटर दूरऔर सुबह के पाली मे यानी 9 बजे से था। पखंडु ने सोचा क्यों न कुछ कमाइ कर ली जाये , परिच्छा तो होती रहती है हो ही जायेगी पर किया क्या जाये, बहुत सोचने बिचारने पर एक आीडीया आया लेकिन उस पर अमल करना खतरनाक था ।पकड़े जाने पर पिटाइ हो सकती थी पर पखंडु पिटाइ से कब डरने वाले थे बस चल दिये अपने मिशन पर । रात को ही गांव मे चोरी से लोगो के कटहल चुराये और सुबह ही सुबह सााइकिल ली बोरे मे कटहल भरा और चल दिये कि सुबह सुबह मंडी मे बेच देंगे पर अभी परेशानी खत्म नही हुयी थी आधे रास्ते ही पहुंचे थे कि साइकिल पंक्चर हो गयी ।अब इतनी सुबह पंक्चर बनाने वाला मुश्किल था पर कुछ पूछ - ताछ करने पर पता चला कि पास मे हि एक आदमी है जो मदद कर सकता है यानी पंक्चर बना सकता है पर उस आदमी ने इनसे पंक्चर ठीक करने के बदले जब पैसे मांगे तो इनको याद आया कि चोरी करने के चक्कर मे और घर से जल्दि निकलने के चक्कर मे पैसे तो घर पर छोड़ आये है , पंकचर बनाने वाले ने भी भॉप लिया कि कुछ गड़बड़ है । उसने बोला पैसे दो नहीं तो ये बोरा यहीं छोड़ जाओ। बेचारे पखंडु के पास कोइ चारा न था बोरी वही छोड़ दी और वापस घर कि तरफ चल दिये क्योकि अब इक्जाम देने का कोइ मतलब नहीं रहा । गांव पर सब लोग परेशान थे कि रात को पता नहीं कौन कटहल चुरा ले गया इनको आते देख किसी ने इनसे पूछ लिया कि इक्जाम देने नहीं गये क्या , इनके मुह से निकला - अब का परिच्छा देने जाये "कटहल" । लोगो को समझते देर नही लगी क् कटहल इन्होने ही चुराया है बस लोगो ने जम कर कूट दिया । तब से आज तक कसम खाते है और सपने भी चोरी से बचते है और साथ मे ये भी कहते हैं कि चोरी का धन मोरी मे जाता है का इससे अच्छा उदाहरण नही हो सकता , बाकी जो है सो हइयै है । 

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